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Masaan

Masaan

Masaan left me sitting for a good while in my seat after the closing credits, pondering over what I had seen. And that is what drove me to write, albeit after a considerable delay.

So, its a fairly good, concise and hard hitting feature film with performers who definitely seem to know the nuances of acting and theatrics. The film opens with two adults hiring a ‘by the hour’ hotel to experience sex out of curiosity. Quite naive, I say, in our country. There is a police raid at the hotel and the moral lecture begins with the ironical photography and videography of the ‘consenting‘ adults as an enabler to blackmail them later. Long story short, the boy commits suicide for the fear of humiliation and the girl is brought to the police station where her father is summoned so as to elaborate in details the consequences of her action and possible case of abetment of suicide. Needless to say, the father is suitably terrified, coerced and threatened into paying a hefty sum of money to buy the investigating officer’s silence.

Richa Chaddha and Sanjay Mishra have beautifully portrayed the characters and it is difficult to put their character sketch in words. As a curious, small town educated, employed and independent girl, Richa has emoted so beautifully that it is difficult to believe she is merely acting. Sanjay Mishra as the Sanskrit professor who retired from the job for her daughter’s sake and took up part time translation and performing last rites of deceased in return of meagre income, successfully highlights the internal struggle going on between a dutiful and doting father on one side and a society rule bound pandit on the other. His relationship with the small boy Jhonta (Nikhil Sahni) who helps him at his makeshift shop and dives in Ganges to collect coins as a gambling sport is another wonderful human relationship at its best.

Vicky Kaushal, as a lower caste civil engineering student with hopes of a good job sans discrimination, is shown to be unhinged when trying to come to terms with the reality of his budding relationship with a high class girl. Wooing the girl through Facebook chats and trinkets at festival fair, the confusion and small successes and happiness, the growing intimacy and apprehensions, lead the viewer to be one of those rooting for him. And then, when all is good, suddenly life strikes, with death. The fact that he ends up being the one who burns her corpse while helping out his folks in their daily job at the ghat adds to the poignancy of the tragic death of his girlfriend.

The losses suffered by various characters in the movie in their daily course of life shown with the kind of emotions they are actually dealt with, and not as some melodrama, makes the film real and so much more impactful. Adding to the beauty are the poetic lines – “Tu kisi rail si gujarti hai, main kisi pul sa thartharata hun” and the fact that their is some hope at the end, at sangam, in life.

Highly Recommended.

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Jab Sheher Humara Sota Hai – Gulaal – Lyrics – Hindi

एक वक़्त की बात बताएं एक वक़्त की
जब शहर हमारा सो गयो थो वो रात गजब की

हे चारो और सब ओर दिशा से लाली छायी रे
जुगनी नाचे चुनर ओढ़ के, खून नहायी रे
हे चारो और सब ओर दिशा से लाली छायी रे
जुगनी नाचे चुनर ओढ़ के, खून नहायी रे

सब ओरो गुलाल पुत गया, सब ओरो में
हे सब ओरो गुलाल पुत गया, विपदा छायी रे

जिस रात गगन से खून की बारिश आई रे
जिस रात शहर में खून की बारिश आई रे
जिस रात गगन से खून की बारिश आई रे
जिस रात शहर में खून की बारिश आई रे

सराबोर हो गया शहर और सराबोर हो गयी धरा
सराबोर हो गया रे जत्था इंसानो का बड़ा बड़ा
सभी जगत ये पूछे था, जब इतना सब कुछ हो रियो थो
तो शहर हमारा काहें भाईसाब आँखे मूँद के सो रियो थो
तो शहर ये बोल्यो नींद गजब की ऐसी आई रे

जिस रात गगन से खून की बारिश आई रे
जिस रात शहर में खून की बारिश आई रे
जिस रात गगन से खून की बारिश आई रे
जिस रात शहर में खून की बारिश आई रे

सन्नाटा वीराना ख़ामोशी अंजानी
जिंदगी लेती है करवटे तूफानी
घिरते है साये घनेरे से
रूखे बालो को बिखेरे से
बढ़ते है अँधेरे पिशाचों से
काँपे है जी उनके नाचो से
कही पे वो जूतों की खट खट है
कही पे अलावो की चट पट है
कही पे है झींगुर की आवाज़ें
कही पे वो नलके की टप टप है
कही पे वो काली सी खिड़की है
कही वो अँधेरी सी चिमनी है
कही हिलते पेड़ों का जत्था है
कही कुछ मुंडेरों पे रखा है

रे रे रे …… रे रे रे रे …

सुनसान गली के नुक्कड़ पे जो कोई कुत्ता
चीख चीख कर रोता है
जब लैंप पोस्ट की गंदली पिली घुप रोशनी
में कुछ कुछ सा होता है
जब कोई साया खुद को थोड़ा बचा बचा कर
गुम सायो में खोता है
जब पूल के खम्बो को गाडी का गरम उजाला
धीमे धीमे धोता है
तब शहर हमारा सोता है
तब शहर हमारा सोता है
तब शहर हमारा सोता है

जब शहर हमारा सोता है, तब मालुम तुमको
हाँ क्या क्या होता है
इधर जगती है लाशें
ज़िंदा हो मुर्दा, उधर ज़िन्दगी खोता है
इधर चीखती है दुआ
खैराती उस अस्पताल में बिफरी सी
आँख में उसके अगले ही पल
गरम माँस का नरम लोथड़ा होता है
इधर उठी है तक़रारें, जिसमों के झटपट लेन देन में उची सी
उधर घांव रिसते फूँकों, दूर गुज़रती आँखे देखे रूखी सी
लेकिन उसको लेके रंग बिरंगे मेलों में गुंजाइशें होती है
नशे में डूबे सेहन से खूँखार चुटकुलों की पैदाइश होती है
अधनंगे जिसमो की देखो लिपी पुती सी लगी नुमाइश होती है
लार टपकते चेहरों को कुछ शैतानी करने की ख़्वाहिश होती है
वो पूछे हैं हैरान होकर, ऐसा सब कुछ होता है कब
वो बता लो उनको ऐसा तब तब तब तब होता है
जब शहर हमारा सोता है
जब शहर हमारा सोता है
जब शहर हमारा सोता है

जब शहर हमारा सोता है

Raat Ke Musafir – Gulaal – Lyrics – Hindi

हो रात के मुसाफिर तू भागना संभल के
पोटली में तेरी हो आग न संभल के
रात के मुसाफिर तू भागना संभल के
पोटली में तेरी हो आग न संभल के
रात के मुसाफिर

चल तो तू पड़ा है, फासला बड़ा है
जान ले अँधेरे के सर पे खून चढ़ा है

चल तो तू पड़ा है, फासला बड़ा है
जान ले अँधेरे के सर पे खून चढ़ा है

मुकाम खोज ले तू , मकान खोज ले तू
इंसान के शहर में, इंसान खोज ले तू
देख तेरी ठोकर से, राह का वो पत्थर
माथे पे तेरे कस के लग न जाए उछल के

हो रात के मुसाफिर तू भागना संभल के
पोटली में तेरी हो आग न संभल के
हो रात के मुसाफिर …

माना की जो हुआ है, वो तूने भी किया है
इन्होने भी किया है, उन्होंने भी किया है
माना की तूने हाँ, हाँ, चाहा नहीं था लेकिन
तू जानता नहीं की ये कैसे हो गया है
लेकिन तू फिर भी सुन ले, नहीं सुनेगा कोई
तुझे ये सारी दुनिया, खा जाएगी निगल के
तुझे ये सारी दुनिया, खा जाएगी निगल के

हो रात के मुसाफिर तू भागना संभल के
पोटली में तेरी हो आग न संभल के
रात के मुसाफिर तू भागना संभल के
पोटली में तेरी हो आग न संभल के
रात के मुसाफिर

Aarambh Hai Prachand – Gulaal – Lyrics – Hindi

आरम्भ है प्रचंड,
बोले मस्तकों के झुण्ड,
आज जंग की घडी की तुम गुहार दो

आन, बान ,शान या की जान का हो दान,
आज एक धनुष के बाण पे उतार दो

मन करे सो प्राण दे जो,
मन करे सो प्राण ले जो,
वही तो एक सर्व शक्तिमान है
ईश की पुकार है, ये भागवत का सार है
की युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है

कौरवों की भीड़ हो,
या पांडवो का नीड हो
जो लड़ सका है वो ही तो महान है

जीत की हवस नहीं
किसी पे कोई वश नहीं
क्या जिंदगी है ठोकरों पे मार दो
मौत अंत है नहीं तो मौत से भी क्यों डरे
ये जाके आसमानो में दहाड़ दो

आरम्भ है प्रचंड ….

हो दया का भाव या की शौर्य का चुनाव
या की हार का वो घाव तुम ये सोच लो
या की पूरे भाल पर जल रहे विजय का लाल
लाल ये गुलाल तुम ये सोच लो
रंग केसरी हो या मृदुंग केसरी हो
या की केसरी हो लाल तुम ये सोच लो

जिस कवि की कल्पना में जिंदगी हो प्रेम गीत
उस कवि को आज तुम नकार दो
भीगती नसों में आज, फूलती रगों में आज
आग की लपट का तुम बघार दो

आरम्भ है प्रचंड ….

O Ri Dunia – Gulaal – Lyrics – Hindi

ओ री दुनिया, ओ री दुनिया, ऐ दुनिया

सुरमयी आँखों के प्यालो की दुनिया, ओ दुनिया
सतरंगी रंगो, गुलालों की दुनिया, ओ दुनिया

अलसायी सेजो के फूलों की दुनिया, ओ दुनिया रे
अंगड़ाई तोड़े कबूतर की दुनिया, ओ दुनिया रे
करवट ले सोयी हकीक़त की दुनिया, ओ दुनिया
दीवानी होती तबियत की दुनिया, ओ दुनिया
ख्वाहिश में लिपटी ज़रुरत की दुनिया, ओ दुनिया रे
इंसान के सपनो की, नीयत की दुनिया, ओ दुनिया
ओ दुनिया रे, ओ दुनिया रे, ओ दुनिया रे
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

ममता की कहानी की दुनिया, ओ दुनिया
बहनों की सिसकी जवानी दुनिया, ओ दुनिया
आदम के हव्वा से रिश्तो की दुनिया, ओ दुनिया रे
शायर के फीके लब्ज़ों की दुनिया, ओ दुनिया
ग़ालिब के मोमिन के ख्वाबों की दुनिया
मजाज़ो के उन इंकिलाबों की दुनिया

फ़ैज़ -ऐ- फ़िराक़ – ओ – साहिर – ओ – मखदूम – मीर की, ज़ौक़ की दाग़ों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ?
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ?
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ?

पल छिन में बातें चली जाती है
पल छिन में रातें चली जाती है
रह जाता है जो सवेरा वो ढूंढने
जलते मकान में बसेरा वो ढूंढने
जैसी बची है वैसी की वैसी, बचा लो ये दुनिया
अपना समझ के अपनों के जैसी उठा लो ये दुनिया
छिटपुट सी बातों में जलने लगेगी, सम्भालो ये दुनिया
कट पिट के रातों में पलने लगेगी, सम्भालो ये दुनिया

ओ री दुनिया
ओ री दुनिया
वो कहें है की दुनिया ये इतनी नहीं है
सितारों से आगे जहां और भी है
ये हम ही नहीं है वहाँ और भी है
हमारी हर एक बात होती वही है
हमे ऐतराज़ नहीं है कहीं भी
वो आलिम है , फ़ाज़िल है, होंगे सही भी

मगर फलसफा ये बिगड़ जाता है जो वो कहते हैं
आलिम ये कहता वहाँ ईश्वर है
फ़ाज़िल ये कहता वहाँ अल्लाह है
कामिल ये कहता वहाँ ईसा है
मंज़िल ये कहती तब इंसान से की
तुम्हारी है तुम ही सम्भालों ये दुनिया
ये बुझते हुए चंद बासी चिरागों
तुम्हारे ये काले इरादो की दुनिया

ओ री दुनिया
ओ री दुनिया